अब ना होगें पत्थर बाज/कश्मीर की वर्त्तमान स्थिति को बयां करती कविता

आज पूरे फ़लक पर है चाँद,
कोई इस चाँदनी की तपन में, 
तप रहा है ,तो कोई ;
इस चाँदनी में सराबोर हुआ है ।

टूट गया तीन सौ सत्तर का किला ,
ढ़ह गयी , पैतीस- 'ए' की दीवारें 
काले धुएँ से अब तक;
भरा था जो आकाश, 
वह धुआँ आज छट गया है, 
इतिहास ही नहीं-
पूरा भूगोल बदल गया है ।

एक झंडा, एक नारा ,एक हुआ;
हमारे संसद का संविधान, 
अब ना होगें पत्थर बाज, 
ना होगें , जम्हूरियत के दुश्मन, 
मुख्य धारा से जुड़ेगा 
अब हर एक कश्मीरी ,
हर किसी की होगी,  अपनी एक पहचान ।

                     अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'
                      डेहरी आन सोन रोहतास (बिहार)

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