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दलित चेतना का विद्रूप चित्र - हाशिए का चाँद /एक पुस्तक समीक्षा/ पुस्तक लेखक डाॅ. हरेराम सिंह

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                   " कब तक रहेगा ब्राह्मणों  का कब्जा                      इस समाज पर                       कब समाज मुक्त होगा                       उनकी मुट्ठी से                       कब उन्मक्त हो सभी सांसे लेंगे                         गैर ब्राह्मण                          कब हसेंगे ? " डाॅ.हरेराम सिंह की इस छोटी सी कविता में , जिसे उनके ताजातरीन  कविता संग्रह ' हाशिए का चाँद ' ( किशोर विधा निकेतन प्रकाशन वाराणसी, मूल्य 400) लगभग कवि के बुनियादी जीवन के यथार्थ और तल्ख अनुभव व व्यवहार को दर्शाता है, जो कवि की विश्व दृष्टि यानी समाज में घटित घटनाओं का एक विविध प्रपत्र ...

अब ना होगें पत्थर बाज/कश्मीर की वर्त्तमान स्थिति को बयां करती कविता

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आज पूरे फ़लक पर है चाँद, कोई इस चाँदनी की तपन में,  तप रहा है ,तो कोई ; इस चाँदनी में सराबोर हुआ है । टूट गया तीन सौ सत्तर का किला , ढ़ह गयी , पैतीस- 'ए' की दीवारें  काले धुएँ से अब तक; भरा था जो आकाश,  वह धुआँ आज छट गया है,  इतिहास ही नहीं- पूरा भूगोल बदल गया है । एक झंडा, एक नारा ,एक हुआ; हमारे संसद का संविधान,  अब ना होगें पत्थर बाज,  ना होगें , जम्हूरियत के दुश्मन,  मुख्य धारा से जुड़ेगा  अब हर एक कश्मीरी , हर किसी की होगी,  अपनी एक पहचान ।                      अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'                       डेहरी आन सोन रोहतास (बिहार)

कवि : अभिषेक कुमार 'अभ्यागत' की कविता : दोस्ती

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देखते ही देखते, हवाओं सा उड़ गय, कभी जो हमने साथ; बिताए थे, दोस्तों के संग । वो मस्ती, वो  रंग, वो उमंग, आज वह हवाएं मौन दिशा से उड़कर, उन दोस्तों की छवि गंध लिए; मेरे चित्त को महकाने आयी है, उनकी यादों की बरसात लिए, उमड़ी है, मेरे अंतर्मन को भिगोने, और, मैं भीगकर मानों अपनी दोस्ती का हाथ थामें, अपने दोस्तों के साथ चल रहा हूँ ।                    - अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'

कवि : अभिषेक कुमार 'अभ्यागत' की कविता : ईश्वर वन्दना

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भर दे भगवन हम में वह शक्ति , मनोबल हो जाए सुदृढ़ मिटे अंधभक्ति,                तेरी करुणा में डूब कर मैं पार करूँ,                मुझ से अलक्षित ना रहे अखिल व्यक्ति । ले चलो नाथ मुझे उस पथ पर, सत्य और विश्वास हो जिस पथ पर,               तुम हो नदी, मैं हूँ एक किनारा,               तुम ही प्रश्न, तुम ही हो उत्तर । हे प्रभु, मुझे वह प्रकाश बना दे, भूले-भटके मार्ग की पहचान बता दे,               दे सकूँ जो विश्व को मैं,               वही आस, नवजीवन में जगा दे ।                    - अभिषेक कुमार 'अभ्यागत'                                       साभार ('काव्य कुसुमाकर' पुस्तक से )          ...

काव्य कुसुमाकर पुस्तक का कवि परिचय

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प्रकृति में होने वाली घटनाएं, सतत् चलने वाली घटनाएं है । नदियों का बहना ,फूलों का खिलना, मेधों का गर्जन सभी प्रकृति की ऐसी संरचना है,  जो सृष्टि को नहीं अपितु कवि को भी रचता है । कवि इसके कोमल हृदय की कोमलता से भाव-विभोर हो उठता है तथा इसका मानवीकरण कर समाज में इसको उचित स्थान दिलाता है । चर-अचर की अनूठी भाव-भंगिमा का रेखांकन ही कवि और कविता का रचनात्मक उद्देश्य होता है । साहित्य समाज का दर्पण है तो कवि उस दर्पण में पडने वाली छाया है । कविता का सफर कवि के अनुपम अनुभवों से होकर पाठक के हृदय तक पहुँचता है । साहित्य तो मानव सत्ता का अध्ययन है ।                               यहाँ हम बात कुछ कवियों की करें तो उसकी शुरूआत मैं अज्ञेय से करना चाहूँगा क्योंकि यह पुस्तक 'तार सप्तक' की याद दिलाती है । अज्ञेय ने तार सप्तक का संपादन कर हिन्दी काव्य साहित्य में एक नया अध्याय का शुभारंभ किया था । तार सप्तक सात कवियों का एक समागम स्थल है । जहां कवियों का विकास अपनी-अपनी अलग दिशा में हुआ है । अज्ञेय जी द्वारा तार सप्तक क...