काव्य कुसुमाकर पुस्तक का कवि परिचय
प्रकृति में होने वाली घटनाएं, सतत् चलने वाली घटनाएं है । नदियों का बहना ,फूलों का खिलना, मेधों का गर्जन सभी प्रकृति की ऐसी संरचना है, जो सृष्टि को नहीं अपितु कवि को भी रचता है । कवि इसके कोमल हृदय की कोमलता से भाव-विभोर हो उठता है तथा इसका मानवीकरण कर समाज में इसको उचित स्थान दिलाता है । चर-अचर की अनूठी भाव-भंगिमा का रेखांकन ही कवि और कविता का रचनात्मक उद्देश्य होता है । साहित्य समाज का दर्पण है तो कवि उस दर्पण में पडने वाली छाया है । कविता का सफर कवि के अनुपम अनुभवों से होकर पाठक के हृदय तक पहुँचता है । साहित्य तो मानव सत्ता का अध्ययन है ।
यहाँ हम बात कुछ कवियों की करें तो उसकी शुरूआत मैं अज्ञेय से करना चाहूँगा क्योंकि यह पुस्तक 'तार सप्तक' की याद दिलाती है । अज्ञेय ने तार सप्तक का संपादन कर हिन्दी काव्य साहित्य में एक नया अध्याय का शुभारंभ किया था । तार सप्तक सात कवियों का एक समागम स्थल है । जहां कवियों का विकास अपनी-अपनी अलग दिशा में हुआ है । अज्ञेय जी द्वारा तार सप्तक का अंतिम अथवा चौथा संपादन सन् 1976ई॰ में किया गया था । पुनः तार सप्तक की कड़ी में जाने अनजाने यह पुस्तक अर्थात् काव्य कुसुमाकर भी तार सप्तक की कड़ी में जुड़ी नजर आती है । सात कवियों द्वारा रचित पाँचवाँ तार सप्तक सामने आया, जिसमें चार कवि और तीन कवयित्री शामिल हैं ।इन कवियों का कविता का शिल्प, रचना विन्यास सहज और सरस है जिसमें पाठक सहज ही कविता की गहराइयों में समा जाता है ।
जहां हमारे अग्रज कवि रामलखन विधार्थी कविताओं में अपनी बात मुखर होकर करते हैं । साथ ही वह समाज की समस्याओं का ध्यान अपने काव्य कौशल के न्यारेपन के कारण आकृष्ट करते हैं ।
वहीं शोभनाथ धायल जिनका काव्य संस्कार पुरानी प्रवतियों को ओढ़ तुलसीदास, मतिराम, केशव आदि कवियों की याद दिलाता है । घायल की कविताओं में हाशिए पर के लोगों का दर्द मिलता है ।
निरंजन कुमार निर्भय सामाजिक बदलाव के लिए सामाजिक कुरीतियों से लोहा लेते हैं ।निर्भय की कविताएं देखने समझने तक नहीं अपितु उनके अनुभव और व्यवहार को भी संचालित करती है ।
अभिषेक कुमार अभ्यागत एक युवा कवि हैं तथा उनकी कविताओं में प्रकृति स्नेह ही नहीं मातृभाषा हिन्दी और माँ के लिए भी उतना ही स्नेह है जितना एक मजदूर के लिए है । उनकी कविता की पहचान भाषा के व्याकरण से नहीं जीवन के व्याकरण से होती है । इनकी रचनाधर्मिता मानवीय मूल्यों का जीवट चित्र है ।
बबली कुमारी एक ऐसी कवयित्री है जो अपनी कविताओं में बोलतीं है वो वेवाकी से अपने चारों ओर व्याप्त भ्रष्टाचार ,दुर्व्यवहार ,नारी उत्पीड़न आदि के विरुद्ध उनके न्याय और सुधार की पुरजोर वकालत करतीं हैं । वह पुरे देश में अमन-शांति के लिए एक नया बदलाव लाना चाहती है ।
पंखुरी सिन्हा का धुमक्ड साहित्य सभी प्रकार के बंधनों से मुक्त एक नये आकाश की आकांक्षा लिए पुराने प्रतिमानों को तोड़ नूतन प्रतिमान गढती है उनका काव्य दर्शन बहुत व्यापक होने के साथ-साथ परिमार्जित भी दिखाई पड़ता है ।
किरण यादव उन कवयित्रियों में है जिनका काव्य साहित्य नारी समाज की दुर्दशा का परिसंस्कार करती नजर आती है ।उनकी कविता नारी उत्थान के लिए है । वह अपनी कविताओं में नारी की प्रत्येक पीड़ा प्रत्येक सुख को परिलक्षित कर के चलती हैं ।
संयुक्त काव्य संग्रह 'काव्य कुसुमाकर' मेंसात कवियों ने अपनी-अपनी काव्य शैली को अलग-अलग अंदाज में एक ही थाल में विविध रंगों से सुशोभित किया है । यदि हम साहित्य की दृष्टि से अवलोकन करें तो यह काव्य जीवन के प्रत्येक दशा स्थिति को इस रूप में व्यक्त करता है । मानों वह हमारे जीवन की घटित घटना है । कला की दृष्टि से यह पुस्तक आन्तरिक उद्दवेगों को बाहर निकाल कर मन में नयी स्फूर्ति के साथ-साथ उत्साह और उमंग का संचार भरता है तथा पाठक को अपनी ओर आकृष्ट करता है ।

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